इतिहास
उपभोक्ता के हितों के श्रेष्ठतर संरक्षण और उपभोक्ता विवादों के सरल प्रक्रिया द्वारा कम लागत में शीघ्र व समुचित समाधान के लिए भारतीय संसद द्वारा दिनांक 24 दिसम्बर, 1986 को उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 (1986 का अधिनियम संख्याक68) पारित किया गया है। यह अधिनियम दंडात्मक या निरोधक स्वरूप न होकर क्षतिपूरक स्वरूप का है। यह अधिनियम चार अध्यायों में विभक्त है। अधिनियम का अध्याय 1 परिचयात्मक है जिसमें परिभाषाएं व अधिनियम के विस्तार, प्रारम्भ और लागू होने सम्बन्धी उपबंध हैं। अध्याय 2 के अन्तर्गत केन्द्र, राज्य एवं जिला स्तर पर उपभोक्ता संरक्षण परिषद के गठन व उनके उददेश्य सम्बन्धी उपबंध हैं। अध्याय 3 के अन्तर्गत उपभोक्ता विवाद प्रतितोषअभिकरणों अर्थात जिला फोरमों, राज्य आयोग व राष्ट्रीय आयोग के गठन, अधिकारिता व उनकी कार्य प्रक्रिया आदि से संबंधित उपबंध हैं। अध्याय 4 के अन्तर्गतउपबंधों को कार्यान्वित करने के लिए केन्द्रीय सरकार व राज्य सरकार को अधिसूचना द्वारा नियम बनाये जाने की शक्तियां प्रदान किये जाने संबंधी प्रावधान है। इसी प्रावधान के अन्तर्गत अधिनियम की धारा 30 की उपधारा 2 के अधीन शक्ति का प्रयोग करके प्रदेश सरकार द्वारा अधिसूचना संख्या 485/11-XIX -2/12 खाद्य/2008 देहरादून, 16 नवम्बर, 2011 के माध्यम से उत्तराखण्ड उपभोक्ता संरक्षण नियमावली, 2011 प्रख्यापित की गयी है।
उपभोक्ता सरंक्षण अधिनियम, 1986 की धारा 9 में त्रिस्तरीय उपभोक्ता विवाद प्रतितोषअभिकरणों की स्थापना के उपबंध हैं, जिसके अन्तर्गत राष्ट्रीय स्तर पर ‘राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग’ नई दिल्ली में व प्रत्येक राज्य की राजधानी में ‘राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग’ एवं प्रत्येक जिले में कम से कम एक ‘जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष फोरम’ गठित किये जाने का प्रावधान है। राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद प्रतितोष अयोग को संक्षेप में ‘राष्ट्रीय आयोग’, राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग को संक्षेप में ‘राज्य आयोग’ एवं जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष फोरम को संक्षेप में ‘जिला फोरम’ के नाम से जाना जाता है। राष्ट्रीय आयोग की स्थापना केन्द्र सरकार द्वारा अधिसूचना जारी करके की गयी है। राज्य आयोग एवं जिला फोरम की स्थापना संबंधित प्रदेश सरकार द्वारा अधिसूचना जारी करके की जाती है।
प्रदेश में राज्य आयोग/जिला फोरमों की स्थापना
उत्तराखण्ड में राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग की स्थापना वर्ष 2002 में हुई है। जिला देहरादून, हरिद्वार, उत्तरकाशी, पौड़ी गढ़वाल, टिहरी गढ़वाल, चमोली, पिथौरागढ़, अल्मोड़ा, नैनीताल व उधमसिंह नगर, में जिला फोरम पूर्ववर्ती उत्तर प्रदेश के समय से स्थापित हैं। जिला रुद्रप्रयाग, चम्पावत एवं बागेश्वर में जिला फोरम का गठन वर्ष 2002 में किया गया, इस प्रकार उत्तराखण्ड राज्य में जिला फोरमों की संख्या 13 है ।
राज्य आयोग / जिला फोरमों के अध्यक्ष व सदस्यगण की नियुक्ति का प्रावधान
अधिनियम की धारा 16(1) के अनुसार राज्य आयोग में एक अध्यक्ष एवं राज्य सरकार द्वारा विहित संख्या में, जो दो से कम नहीं हो सकते, सदस्यगण होते हैं, जिनमें से एक महिला सदस्या होती है। धारा 10(1) के अनुसार जिला फोरम में एक अध्यक्ष एवं दो सदस्यगण जिसमें एक महिला हो, होते हैं । राज्य आयोग के अध्यक्ष ऐसे व्यक्ति होते हैं जो किसी उच्च न्यायालय के न्यायाधीश हों या रह चुके हो या होने की अर्हता रखते हों । राज्य आयोग एवं जिला फोरम के सदस्यगण समाज के योग्य, सत्यनिष्ठा एवं प्रतिष्ठा वाले ऐसे व्यक्ति होते हैंजिन्हे अर्थशास्त्र, विधि, वाणिज्य, लेखाकर्म, उद्योग, लोक मामले या प्रशासन से सम्बन्धित समस्याओं को निपटाने का पर्याप्त ज्ञान और कम से कम दस वर्षों का अनुभव हो तथा उनकी आयु 35 वर्ष से कम न हो और मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय से स्नातक की उपाधि प्राप्त हो।
अधिनियम की धारा 16(1)(क) के अनुसार राज्य आयोग के अध्यक्ष की नियुक्ति उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के परामर्श के अनुसार राज्य सरकार द्वारा की जाती है। जिला फोरम के अध्यक्ष/सदस्यगण तथा राज्य आयोग के सदस्यगण की नियुक्ति हेतु अधिनियम की क्रमशः धारा 10(1क) व 16(1क) में निम्नवत चयन समिति के गठन का प्रावधान है, जिसकी संस्तुति के आधार पर राज्य सरकार द्वारा उनकी नियुक्ति की जाती हैः-
- अध्यक्ष, राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग – अध्यक्ष
- प्रमुख सचिव, न्याय एवं विधि परामर्शी – सदस्य
- प्रमुख सचिव/सचिव, प्रभारी उपभोक्ता मामले – सदस्य
अधिनियम की धारा 10(2) के अनुसार जिला फोरम के अध्यक्ष तथा सदस्यगणों को 5 वर्ष अथवा 65 वर्ष की आयु जो भी पहले हो, को पूर्ण करने एवं धारा 16(3) के अनुसार राज्य आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्यगण को 5 वर्ष अथवा 67 वर्ष की आयु पूर्ण करने, जो भी पहले हो, की अवधि तक के लिये नियुक्त किया जाता है। उपभोक्ता विवाद प्रतितोषअभिकरणों के सदस्यगण पुनः नाम निर्देशन के पात्र होते हैं ।
अध्यक्ष / सदस्यगण को देय वेतन / मानदेय एवं सुविधायें
अधिनियम की धारा 10(3) व 16(2) में क्रमशः जिला फोरमों एवं राज्य आयोग के अध्यक्ष / सदस्यगण को देय वेतन / मानदेय व अन्य भत्तों तथा उनकी सेवा शर्तों का निर्धारण राज्य सरकार द्वारा किये जाने का प्रावधान है । अधिनियम की धारा 16(1) के अनुसार राज्य आयोग के अध्यक्ष उच्च न्यायालय के कार्यरत/सेवानिव्त्त न्यायाधीश होते हैं। उत्तराखण्ड उपभोक्ता संरक्षण नियमावली, 2011 के नियम 6(1)(क) के अनुसार राज्य आयोग का अध्यक्ष को, यदि पूर्णकालिक आधार पर नियुक्त किया जाये तो उच्च न्यायालय के न्यायाधीश का वेतन, भत्ते एवं अन्य सुविधायेंदेय हैं । यदि अंशकालिक आधार पर नियुक्त किया जाये तो बैठक के लिए प्रतिदिन रूपये500/- (रूपये पांच सौ मात्र) का संचित मानदेय देय है। राज्य आयोग के सदस्य को यदि पूर्णकालिक आधार पर नियुक्त हैं, तो प्रतिमास रूपये15,262/- (रूपये पन्द्रह हजार दौ सौ बासठ मात्र) का समेकित मानदेय और यदि अंशकालिक आधार पर नियुक्त हैं तो प्रति बैठक के लिए रूपये400/- (रूपये चार सौ मात्र) का समेकित मानदेय देय है। नियम 6 (1)(ख) के अनुसार राज्य आयोग का अध्यक्ष किराया मुक्त सरकारी आवासीय सुविधा का भी हकदार है। यदि राज्य आयोग के अध्यक्ष को ऐसी सुविधा नहीं उपलब्ध होती है, तो वह आवासीय किराया भत्ता उच्च न्यायलय के न्यायाधीश के समान प्राप्त करने का हकदार है। नियम 6(1)(ग) के अनुसार राज्य आयोग का अध्यक्ष शासकीय वाहन के लिये हकदार हैं तथा उनको उच्च न्यायालय में कार्यरत न्यायाधीश के रूप में प्राप्त वाहन के अनुसार डीजल/पैट्रोलअनुमन्य है। वे उन सभी सुविधा व भत्तों को प्राप्त करने के भी हकदार हैं, जो उच्च न्यायालय में कार्यरत न्यायाधीश को अनुमन्य हैं। नियम 6(1)(घ) के अनुसार राज्य आयोग के सदस्यगण को रूपये2,500/-(रूपये दो हजार पांच सौ मात्र) प्रति माह वाहन भत्ता देय है। नियम 6(1)(ड.) के अनुसार राज्य आयोग के सदस्य किराया मुक्त सरकारी आवासीय सुविधा के भी हकदार हैं। यदि राज्य आयोग के सदस्यों को ऐसी सुविधा नहीं उपलब्ध होती है तो वह प्रतिमाहरूपये3,000/- (रूपये तीन हजार मात्र) आवासीय भत्ता प्राप्त करने के हकदार हैं। इसी प्रकार नियमावली के नियम 6(1)(च) के अनुसार राज्य आयोग का सदस्य, यदि पूर्णकालिक आधार पर नियुक्त किया गया है, ऐसी चिकित्सा सुविधा प्राप्त करने के हकदार हैं, जो राज्य सरकार के प्रथम श्रेणी के अधिकारी को अनुमन्य है।
नियमावली के नियम 3(1)(क) के अनुसार जिला फोरम का अध्यक्ष को, यदि पूर्णकालिक आधार पर नियुक्त किया जाये तो जिला न्यायालय के जिला न्यायाधीश का वेतन देय है, यदि अंशकालिक आधार पर नियुक्त किया जाता है तो उन्हें रूपये400/- (रूपये चार सौ मात्र) प्रति बैठक की दर से मानदेय देय है। नियम 3(1)(ख) के अनुसार जिला फोरम का सदस्य यदि पूर्णकालिक आधार पर नियुक्त किया जाये तो रूपये10,176/-(रूपये दस हजार एक सौ छियत्तर मात्र) प्रति माह मानदेय और यदि अंशकालिक आधार पर नियुक्त किया जाये तो रूपये300/-(रूपये तीन सौ मात्र) प्रति बैठक मानदेय देय है। नियम 3(1)(ग) के अनुसार जिला फोरम का अध्यक्ष प्रति माह रूपये2,400/-(रूपये दो हजार चार सौ मात्र) मकान किराया भत्ता प्राप्त करने का हकदार है बशत्र्ते वह पूर्णकालिक आधार पर नियुक्त किया गया हो और उसे कोई सरकारी आवासीय सुविधा उपलब्ध नहीं कराई गई हो। नियम 3(1)(घ) के अनुसार जिला फोरम का सदस्य रूपये1,800/-(रूपये एक हजार आठ सौ मात्र) प्रतिमाह मकान किराया भत्ता प्राप्त करने का हकदार है बशत्र्ते उसे कोई सरकारी आवासीय सुविधा उपलब्ध नहीं कराई गई हो। नियम 3(1)(ड.) के अनुसार जिला फोरम का अध्यक्ष यदि पूर्णकालिक आधार पर निुयक्त किया जाये तो रूपये1,830/- (रूपये एक हजार आठ सौ तीस मात्र) प्रति माह वाहन भत्ता प्राप्त करने का हकदार है। इसी प्रकार नियमावली के नियम 3(1)(च) के अनुसार जिला फोरम का सदस्य यदि पूर्णकालिक आधार पर निुयक्त किया जाये तो रूपये1,830/- (रूपये एक हजार आठ सौ तीस मात्र) प्रति माह वाहन भत्ता और यदि अंशकालिक आधार नियुक्त किया जाये तो रूपये50/-(रूपये पचास मात्र) प्रति बैठक वाहन भत्ता प्राप्त करने का हकदार है।
नियमवाली के नियम 6(2) के अनुसार राज्य आयोग का अध्यक्ष सरकारी दौरे पर ऐसे यात्रा भत्ता और दैनिक भत्तों को प्राप्त करने का हकदार है जो उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को अनुमन्य हों व नियमावली के नियम 6(3) व 3(2) के अनुसार क्रमशः राज्य आयोग के सदस्य एवं जिला फोरम के अध्यक्ष और सदस्य सरकारी दौरे पर ऐसे यात्रा भत्ता और दैनिक भत्तों को प्राप्त करने का हकदार है, जो राज्य सरकार के प्रथम श्रेणी के अधिकारी को अनुमन्य हों।
अध्यक्ष / सदस्यगण के भरे व रिक्त पदों की स्थिति
राज्य आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्य के पद वर्तमान में भरे हुये हैं । दिनांक 30 नवंबर, 2021 तक की स्थिति के अनुसार जिला फोरम के सभी अध्यक्ष पद भरे हुये हैं तथा सदस्य के पद भरे हुये हैं ।
राज्य आयोग / जिला फोरमों हेतु स्वीकृत अधिकारी/कर्मचारी वर्ग
राज्य आयोग के प्रशासनिक नियंत्रण के साथ-साथ जिला फोरमों को स्थापित करने एवं उपभोक्ता न्यायिक कार्यप्रणाली को अधिक गतिशील बनाये जाने हेतु राज्य आयोग के अध्यक्ष को विभागाध्यक्ष घोषित किया गया है । राज्य आयोग एवं जिला फोरमों में प्रभावी प्रशासनिक नियंत्रण के लिए राज्य आयोग में निबंधक का एक पद सृजित होता है उच्चतर न्यायिक सेवा संवर्ग अधिकारी की नियुक्ति की जाती है । निबंधक, जिला फोरम एवं राज्य आयोग में सृजित अराजपत्रित पदों का नियुक्ति प्राधिकारी भी हैं । राज्य आयोग तथा जिला फोरमों में अध्यक्ष एवं सदस्यगण के अतिरिक्त राज्य आयोग में वैयक्तिक अधिकारी, वरिष्ठ वैयक्तिक अधिकारी, लेखाकार, प्रशासनिक अधिकारी, प्रधान सहायक, सहायक लेखाकार, प्रवर सहायक के एक-एक पद, वैयक्तिक सहायक व कनिष्ठ सहायक के दो पद, अनुसेवक के चार पद सृजित हैं ।
जिला फोरमों में वरिष्ठ सहायक, आशुलिपिक संवर्ग व कनिष्ठ सहायक के 13-13 पद व अनुसेवक के कुल 17 पद सृजित हैं । पूर्णकालिक जिला फोरम क्रमशः देहरादून, हरिद्वार, नैनीताल व उधमसिंह नगर में सफाई कर्मचारी का एक-एक पद आऊटसोर्सिंग के माध्यम से सृजित है ।